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Recent Posts
 17:44 | 14/Nov/2008 | 4 Comment(s)
SHORYA KO BADNAM NA KARO !!

पतझड़ की नंगी डाली

अकडी हुई, कुरूप
वसंत की कोमल कलियों
और पत्तियों से लदी
झुकी हुई, सुरूप
तुम किसे कहते हो यथार्थ ?
दोनों को !
तो फिर
शोर्य को बदनाम न करो !!

कु@संत
गुड़गांव

Permalink 
 09:54 | 12/Nov/2008 | 8 Comment(s)
BECHARA BHALA AADMI !

चिकने पारदर्शी काँच को मत तोड़ो
नहीं तो .... ये टुकड़े
नुकीले और धारयुक्त बन
काट खायेंगे !
बेचारा भला आदमी !
चिकने पारदर्शी काँच की तरह है
मत तोड़ो उसे !!!!

कु@संत
गुड़गांव

Permalink 
 09:48 | 11/Nov/2008 | 4 Comment(s)
JINDAGI : AFSOS ME NAHIN DHAL SAKTI !

उस मोहनी मूरत
को तोड़ दो !
जो केवल भूख पैदा करती है
अन्न नहीं !
जो चंद सिक्कों मे ढलती है
प्रेम में नहीं !
जो केवल जीवन देती है
यौवन नहीं !
दोस्त ! वो मूरत बेकार है
जो खून का मोल न समझे
इंसान की पुकार पर नाच ना उठे
उस आराधना से क्या मतलब ?
जो हमें संतोष न दे
मौत की राह दिखावे परंतु
अमरत्व न दे
मैं जानता हूँ
तूने उसे
अपने हाथों गढ़ा है
और तुझे हीं
तोड़ना भी होगा
तुम्हारी कला अभिशाप बनकर नाच उठी है
अब तुझे उसे
वरदान बनाना होगा
क्योकि................जिंदगी
अफसोस में नहीं ढल सकती
उसे संतोष देना हीं होगा!!!!!

कु@संत
गुड़गांव

Permalink 
 16:36 | 1/Nov/2008 | 8 Comment(s)
DURUPYOG !

जो लोग सदियों से
भारत के सपूत
कहलाते आ रहे हैं
वहीं.............
भारत माता के
संस्कृति और सभ्यता को
शिष्टता और शाम्यता को
पश्चिमी सभ्यता की
आड़ लेकर
पैसों से
भुना रहे हैं !
कु@संत
गुड गाँव

Permalink 
 15:11 | 30/Oct/2008 | 1 Comment(s)
BHARAT ! MAA !

भारत !
सभ्यों की....
भारत !
दुष्टों की........
भारत !
पवित्रों की.......
भारत !
अपवित्रों की.......
तभी तो
भारत !
माँ !!!

कु@संत
गुड गाओं

Permalink 
 12:30 | 27/Oct/2008 | 7 Comment(s)
BHRAM !

लगता है रात ने भी
देखा होगा आईना कभी.................
मगर !
अंधेरे मे वो
देखी भी क्या होगी ?
दिखाई भी कुछ
नहीं दिया होगा.............!
तभी तो
रात भी
मन हुश लगती है
उदास आदमीं की तरह
मेरी तरह !
कभी-कभी !
कु@संत
गुड़गांव

Permalink 
 13:20 | 10/Oct/2008 | 7 Comment(s)
EKANT !!

एकांत में..............
फुर्सत मिलते हीं
घिर जाता हूँ मैं, कई लोगों से
जो मुझसे घृणा करते है, मुझे पता है
खो जाता हूँ मैं कहीं
करने लगता हूँ
आविष्कार
अपने बेबुनियाद स्वप्नों का
स्वप्नों के सिवा
मिला भी क्या है मुझे
आज तक.............
और मिलेगा भी क्या......आगे ?
अतीत......हाँ !
मैं कितना भी अपने अतीत से
पीछा छुड़ाने की कोशिश करता हूँ
वो और मेरे पीछे हीं पॅड जाता है
उम्र आधी हो चली है
पर नहीं समझे !
जिंदगी का मर्म
रत्ती भर नहीं समझे !!
सचमुच जिंदगी का मर्म
नहीं समझ पाया अभी तक !
और ना हीं समझ पाउन्ग1
ऐसा लगता है मुझे !!!
******************************************************
किसी को दर्दे दिल सुनाने में क्या रखा है ,
किसी को अपना गम बताने मे क्या रखा है,
अब तो उदास रहने की आदत सी हो गयी है..........
वरना उदास रहने मे क्या रखा है ??????????
*******************************************
कु@संत
नई दिल्ली

Permalink 
 15:53 | 3/Oct/2008 | 5 Comment(s)
EK PRASHNA CHINHA ?

यह भीगी हुई रात
मेरे लिए ...........
एक अजीब सी
कसक छोड़ गयी है
जिसे तड़प भी
कहा जा सकता है
इंसान के वश में
हैं हीं क्या .........?
अपने कर्मों का फल
जिसे हर एक को
भोगना पड़ता है !!
हाँ ! इंसान का जीवन
सहानुभूति, सदाचार और प्यार
की भावना से
लबालब होना चाहिए
पुरानी यादें...............
कितनी भी धुंधली हो जाए
कभी ना कभी
याद आ हीं जाती है
और !
छोड़ जाती है
पूरे अस्तित्व पर
एक प्रश्न चिन्ह !!!!!!
कु@संत
नई दिल्ली

Permalink 
 11:31 | 27/Sep/2008 | 7 Comment(s)
JEETA CHALA JAUNGA!!!!!

मैं ज़िंदा हूँ........... अपने सीने में
जज्बातों और गमों को
लिए हुए
नहीं जानता मैं
ऐसा करने से
क्या मिलता है ?
मगर फिर भी
जिए चला जा रहा हूँ
सपने कसककर छितरा जाते हैं
और मैं
खुद को हीं पहचानने में
असमर्थता महसूस करता हूँ
क्यो हो रहा है ऐसा
मेरे साथ हीं....
क्यो जिए जा रहा हूँ मैं
शायद कायरता आ गयी है मुझमे
मौत से डरने लगा हूँ मैं......
मगर...............नहीं ....................नहीं
कायर तो खुद को मारते हैं
उसे जिसे कोई बचाने वाला नहीं
मृत्यु से पहले बहुत कम हीं
खुद को पहचान पाते हैं
लगता है मैं भी
तबतक, खुद को नहीं पहचान पाउन्गा !
इतने गम और टूटे सपनों के साथ
खुद को पहचाना भी
तो नहीं जा सकता
हम जीवन को जैसा देखते हैं
वैसी हमारी नियति बन जाती है
फिर भी मैं जिऊँगा
इसी गम और टूटे सपनों के साथ
कम से कम
कायर तो नहीं काहलौूँगा !
गम के साथ समझौता करते हुए
जीता चला जाउन्गा!!!!!!!!!!
कु@संत

Permalink 
 15:02 | 17/Sep/2008 | 8 Comment(s)
WO BACHAPAN KI BATAIN !!!!!!

Kahan gaye wo bachapan ki baatain,

Wo Chandani Ratain.........

Dhundha karta tha apni dadi maa ko

Chandani raton main,

Baithkar apne chhat ki munder par

Chand taron me...

Puchhata tha apni maa se..

Maa! dekh rahi hogi na dadi hamain !

Sunkar has deti thi meri maa !

Aaj varshon baad phir se baitha hun

Chhat ki munder par

Dhundh raha hun chand taron me

Phir se.........

Dadi maa ko hin nahin maa ko bhi !

Janta hun nahin milengin ab donon

Kahin bhi...

Koi nahin hai waha

Phir bhi....

Sonchata hun aaj kaun aaega ?

Meri baaton ko sunkar

Hasne ke liye..!!!!

Ku@sant

Gurgaon

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