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KAISE VIDA KARUN ?
पन्ने भी हैं और.......... कलम भी है हाथ में मगर क्या फ़ायदा इस खुले कलम और पन्नों का भी जब शब्द हीं साथ नहीँ दे रहे मेरा दिल मे हैं शब्द भी पर बाहर आने से कतराते हैं दरवाजे खामोश है अंदरूनी खिड़कियाँ भी उदास है आज ना जाने क्यों........? चाहते हुए भी लिख नहीँ पा रहा हूँ कूछ शब्द......... रूठे हुए शब्द...........खिन्न पड़े शब्द..... हमदर्दी से भरे शब्द...... नैतिकता के शब्द......... इंसानियत के शब्द.......... खराब शब्द....... सारे शब्दों के शब्द रूप बदलकर मुझसे बदला लेने पर उतारू हैं कभी तलवार बनकर तो कभी कटार बनकर पर मैं यहीं सोचता हूँ की मेरी जिंदगी इन शब्दों की गिरवी है बिन माँगे मिल जाना उधार जीवन को कम नहीँ देता प्यार मैं जानता हूँ ये बिखरे शब्द मुझे भी बिखेरने वाले हैं मैं ये भी जानता हूँ इतना होते हुए भी मुझे इन शब्दों के बीच हीं रहना है बिना जिंदगी छुड़ाए इन्हें कैसे विदा करूँ ? ................कू संतोष............. ..............नई दिल्ली........... सी@संत
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