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Saturday 5 July, 2008
 13:52 | 22/Nov/2007 |  2 Comment(s)
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NAKALI HUN MAIN !

नकली हूँ मैं !
किसी ने कह दिया मुझे........
मुझे तनिक भी
नहीँ लगा बुरा.....
ना हीं गुस्सा आया
कोई बताए मुझे
कौन नकली नहीँ है........
इस पूरी दुनिया में.
हर वस्तु मिलावट
से भरी है यहाँ
रिश्ते नाते सारे
प्यार के मारे
धूंधले होते जा रहे
अब तो इनमें भी मिलावट
झलकती है बखूबी
लिखने क़ी ज़रूरत है
ना हीं पढ़ने क़ी बात है
इस समय के दौर में
नकली हमारी पूरी जमात है
इस दौड़ती भागती जिंदगी के रेले में
इस जीवन के ठेलम ठेले में
भीड़ हो या अकेले में
दिखता है हर चेहरा नकली
ये अपने अनुभव क़ी है बात
नकली है हर धर्म क़ी परिभाषा
नकली है उनकी हर जात
भूख हर ताल करते हैं लोग नकली
लेकिन जब कभी गाँव मे...........
करती है भूख अपनी आत्महत्या
कोई नहीँ कहता ये है वारदात
होता कुछ और है
दिखता कुछ और है
इस नकली बनने के दौर में
नकली बनने पर हीं
मिलता सिरमौर है !
इस असली और नकली के बिंच
पिसता हुआ मैं लौट जाता हूँ वहीं
जहाँ सारे लोग नकली हैं
फिर कैसे कह दूं ?
कि नकली नहीँ हूँ मैं भी...........
नकली हूँ मैं !
..............कू. संतोष..................
..................नई दिल्ली............
सी@संत

Category: Poetry | Permalink