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MAIN BAN CHALA AWARA !!
मन का मीत पुकार रहा है मैं बन चला आवारा ! जिसका आँचल पकड़ा मैने माँग न भरा सुहाग न दी जिसका कर, कर में ले चूमा कंगन दी पर खनक नहीं ! समय शमा की मोल न समझा सुबह हुआ गंवारा मैं बन चला आवारा ! जिन कलियों को चूमा मैने गीत दी पर आवाज़ नहीं जिसको हँसना सिखलाया मैं गिरा दी हँसकर गाज़ वहीं मैं मतवाला मैं क्या समझा कुछ भी नहीं संवारा मैं बन चला आवारा ! जला दी ऐसी लौ की जिसपर जले फतिंगे हंस-हँसकर बना राख़ बूझकर अंगार प्रेम का दमन जल-जलकर तोड़ दिया जग का सब नाता जग का सबकुछ वारा मैं बन चला आवारा !!!!!! ..................कु. संतोष.......................... सी@संत
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