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SHESH
शेष!!!!!!!!!!!!!! रात के गहराते हीं पढ़ने लगता हूँ अपनी हीं लिखी हुई कविताओं को मैं ! करने लगता हूँ गणना कितने छोटे थे मेरे प्यार से रंगे वो स्वप्न छुपाने के लिए अपने गम अपनी निरीहता और हताशा अपनी रिक्तता भरी ज़िंदगी और उसे भी ! जिसने ! ज़िंदगी भर साथ निभाने का वादा करके............. बींच मझधार में हीं छोड़ गयी मुँह मोड़ गयी .......... मुझसे ! कभी ना वापस आने के लिए बस ! एक गूँगी आह बच जाती है शेष !
..........कु. संतोष........... 31.03.08 गुड़गांव
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