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AAKASH BHAR CHUKA HAI
बूढ़ा बूढ़ा झुर्रियों वाला श्यामवर्ण आकाश थक चुका है......... थक चुका है..! कांप-कांप कर ज्योति खोकर पिल पीला आकाश औंध चुका है.......औंध चुका है...! चेचक नुमा चेहरा बदन मे छिछला-गहरा छोटा बड़ा घाव रिसती हुई लसलासती पीव बिजली का ऑपरेशन बादलों का मरहम दर्द भरी चीत्कार सिसकता आकाश सॅड चुका है......सॅड चुका है....! रो रही प्रकृति नभ है पड़ा विकृति कफन मे लिपटा हुआ खून में सॉना हुआ निष्पंद ! निश्चल ! भावहीन पटता आकाश भर चुका है.....भर चुका है...! उसकी मज़ार पर एक फूल खिल चुका है................खिल चुका है! कु@संत नई दिल्ली
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