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KHOYA HUA AADMI !!!
आदमी खो गया है ! संस्कृति के किनारे सभ्यता के ठेलमठेले में अचेतन के मेले में मन को मारे क्या है पुराना और क्या नया है ? आदमी खो गया है ! जिंदगी सिसकती है शौर्य बिखरता है यौवन तड़पता है पलकों में भावनाएँ टूटकर झलकती है आया है क्या और क्या गया है ? आदमी खो गया है ! कोई अभियान नहीं है दिल धड़कता है जी रुंधता है आवाज़ : बेसहारे निकलती कोई तान नहीं है अजब हो गया क्या गजब हो गया है ? आदमीं खो गया है ! आदमीं खो गया है!!!!!!!!!!!! कु@संत नई दिल्ली
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