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DHARM KA CHITRA !
जब कोई लोकतांत्रिक प्रज़ा का सेवक जनता की आवाज़ देता है संसद विधान सभाओं में दीवारें कांप उठती है और आवाज़ लौट आती है खुद अपने आप में ! दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यहीं है की हमारे सारे धार्मिक आयोजनों तथा त्योहारों में होनेवाला बदलाव मुख्यतः दिखावे के साथ-साथ राजनैतिक-सामाजिक-ब्यवसायिक तीनों का लाभ लेने के लिए तथा आत्मप्रचार के लिए होता जा रहा है ! धर्म, व्रत, संयम तथा समाज और ब्यक्ति की चेतना जागृत करने की दिशा में प्रगति कम हो रही है वहीं धार्मिक स्थानों पर आजकल अमानवीय कृत्य भी बढ़ते जा रहे हैं ! जैसे-जैसे अमानवीय अधार्मिक कृत्यों का जोर बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे गंगा नहाने, हॅज़ करने, कंवरियाँ हों या अमरनाथ यात्रा करने वाले मोटा चन्दा देकर पाप धोनेवालों का तांता बढ़ता हीं जा रहा है ! दुर्गापूजा में जानेवाले फैशन परेड न करें ये संभव नहीं ! आयोजक नेतागिरी न करें प्रशासन राजनीति-समाज में दखलंदाजी न करे ये संभव नहीं ! पर असल बदलाव ये हुआ है हमने व्रत और त्योहारों का बुनियादी भेद मिटा दिया ! लेकिन फिर भी मैं ! दार्शनिक चिंतन समेटे हुए यहीं सोच रहा हूँ.......... आवाज़ की पीड़ा में बिना दिल को द्रवित किए क्यों छोड़ दिया उन कांपती दीवारों को और क्यों ? डूबता-उतराता जा रहा है भारतीय आदर्श ! इस बदलते समय की विचित्र धारा में!!!!!!! कु@संत नई दिल्ली
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