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MAIN TUMHARI YAAD ME !
Main tumhari yaad me, yaad apni kho raha hun ! Saans hai, sansar hai Pyaar hai, Pukar hai jeet wahin haar hai vedna ke palkon me neer-beez bo raha hun... Main tumhari yaad me, Yaad apni kho raha hun ! kya yahin shringar hai ? jiska nahin adhar hai Matra wah udgaar hai sadhna ki baah me baah de main so raha hun.. Main tumhari yaad me yaad apni kho raha hun ! Jeewan na bhar hai, Jeena duswar hai Maut to udhar hai nakdi ki toh me shradha yahan sanjo raha hun.. Main tumhari yaad me yaad apni kho raha hun!!!!!! @k. Santosh Delhi
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AAKASH BHAR CHUKA HAI
बूढ़ा बूढ़ा झुर्रियों वाला श्यामवर्ण आकाश थक चुका है......... थक चुका है..! कांप-कांप कर ज्योति खोकर पिल पीला आकाश औंध चुका है.......औंध चुका है...! चेचक नुमा चेहरा बदन मे छिछला-गहरा छोटा बड़ा घाव रिसती हुई लसलासती पीव बिजली का ऑपरेशन बादलों का मरहम दर्द भरी चीत्कार सिसकता आकाश सॅड चुका है......सॅड चुका है....! रो रही प्रकृति नभ है पड़ा विकृति कफन मे लिपटा हुआ खून में सॉना हुआ निष्पंद ! निश्चल ! भावहीन पटता आकाश भर चुका है.....भर चुका है...! उसकी मज़ार पर एक फूल खिल चुका है................खिल चुका है! कु@संत नई दिल्ली
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KYA BAAT GALAT MAIN KARTA HUN?
मैं गाता हूँ कुछ गीत किराए पर लेकर !क्या बात गलत मैं करता हूँ.....? है आता नहीं गीत गढ़ने मुझको मैं चाह-चाहकर गीत नहीं गढ़ पाता हूँ ! इसीलिए तो गीत किराए पर लेकर मैं गाता हूँ!! क्या बात गलत मैं करता हूँ ? वे कायर हैं जो डरते हैं | वे शायर हैं जो मरते हैं | मुझको मरना क्या ?............डरना क्या.......? बेधड़क मैं गाता हूँ क्या बात गलत मैं करता हूँ ? नेता की बात छोड़ा यारों वो लड़ता है लड़वता है | कुछ नाम कमा लूं मैं भी तो तुझको इसमें क्या जाता है ? मैं उठा पटक की बात नहीं करता ना कुर्सी के लिए हीं लड़ता हूँ क्या बात गलत मैं करता हूँ ? हैं छूट सभी को घर मे रहना और किराए देने की है छूट नहीं क्या दें पैसा बस गीत किसी को लेने की क्या गलत काम है यह करना मैं अब तक समझ ना पाता हूँ कितने गाते हैं गा-गाकर वे नाम उछाला करते हैं स्वर भी ले-लेकर के उधार वे रॉब जमाया करते हैं मैं गाता हूँ अपने स्वर में क्या बात गलत मैं करता हूँ ? ले गीत किराए पर मैं सभी जगह गा पाता हूँ .!!!! कु@संत नई दिल्ली
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PANCHHI
पहले झुरमुट में.पंछी चहकते थे अब पंछी तो हैं लेकिन झुरमुट नहीं इसीलिए तो वे चहकते नहीं...... कभी.....कभार चे-चे कर रह जाते हैं पंख फड़फड़ाकर भी पहले जैसे उड़ नहीं पाते हैं यादों में खोए हुए सपनों के साथ तोड़ा जी लेते हैं सांस नहीं आह भर गम को पी लेते हैं ! कु@संत गुडगाव
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MAT SIYO USE
मलमल का गमछा झीना हो रहा है तो......... झीना होने दो फट जाने दो मत सिओ उसे किसी रेशम के धागे से मत लगाओ पेबंद अनमेल रेशम के धागे से मजाक है मलमल का व्यंग्य है जीवन का गलती है उस सीने वाले की फटता है गमछा तो फटने दो मत सिओ उसे.....
कु@संत... 27.05.08
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AAKHIR JINDAGI KI PATRI HOTI KAUN SI HAI?
आख़िर जिंदगी क़ी पटरी होती कौन सी है ? दीवार पे चिपकी हुई छिपकली हमेशा लगी रहती है टोह में..... कीट - पतंगों की दौड़ती भागती जिंदगी मगर ! जब खुद पे आती है मौत...... अपनी हीं पुंछ जो उसका जीवन बचती है तोड़कर भागती है उस बीते वर्ष के समान जो भागता है नव-वर्ष को देखकर दूमा दबाए दोनों को देखा है मैने मगर समझ नहीं पाया मैं! आज तक..........आखिर जिंदगी की पटरी कौन सी होती है? ............................
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SHESH
शेष!!!!!!!!!!!!!! रात के गहराते हीं पढ़ने लगता हूँ अपनी हीं लिखी हुई कविताओं को मैं ! करने लगता हूँ गणना कितने छोटे थे मेरे प्यार से रंगे वो स्वप्न छुपाने के लिए अपने गम अपनी निरीहता और हताशा अपनी रिक्तता भरी ज़िंदगी और उसे भी ! जिसने ! ज़िंदगी भर साथ निभाने का वादा करके............. बींच मझधार में हीं छोड़ गयी मुँह मोड़ गयी .......... मुझसे ! कभी ना वापस आने के लिए बस ! एक गूँगी आह बच जाती है शेष !
..........कु. संतोष........... 31.03.08 गुड़गांव
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MAIN BAN CHALA AWARA !!
मन का मीत पुकार रहा है मैं बन चला आवारा ! जिसका आँचल पकड़ा मैने माँग न भरा सुहाग न दी जिसका कर, कर में ले चूमा कंगन दी पर खनक नहीं ! समय शमा की मोल न समझा सुबह हुआ गंवारा मैं बन चला आवारा ! जिन कलियों को चूमा मैने गीत दी पर आवाज़ नहीं जिसको हँसना सिखलाया मैं गिरा दी हँसकर गाज़ वहीं मैं मतवाला मैं क्या समझा कुछ भी नहीं संवारा मैं बन चला आवारा ! जला दी ऐसी लौ की जिसपर जले फतिंगे हंस-हँसकर बना राख़ बूझकर अंगार प्रेम का दमन जल-जलकर तोड़ दिया जग का सब नाता जग का सबकुछ वारा मैं बन चला आवारा !!!!!! ..................कु. संतोष.......................... सी@संत
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TUNE SIKHA DIYA!!!!!
हर घड़ी तूने याद में जलना सिखा दिया, जीवन लिटा के कब्र मे दफनाना सिखा दिया ! खोया था मौज में मैं दुनिया-मज़ार में, शागिर्द बन गया था . मैं जीत हार में, जब तक तू ले कफन को ओढना सिखा दिया, जीवन लिटा............................................. ! मंज़िलें बहार बनकर . पतझड़ तूने बुलाया, दो गीत क्या तू गायी रोना मुझे सताया दो दग्ध आंसूं देकर तूने गलना सिखा दिया जीवन लिटा............................................... ! उलझा तुम्हारे जुल्फ में नर्गिश के ख्वाब से, खेली तू हँसते-हँसते मेरे हीं आव से मुस्करा के तूने ऐसे में मरना सिखा दिया जीवन लिटा के कब्र में जलना सिखा दिया!!!!!!!!!!!!
कु. संतोष नोएडा सी@संत
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PREM PATRA
बन जाते हैं शब्द अपने आप........... शब्दों से मिलकर वाक्य अठखेलियाँ करते हैं पन्नों पर कलम के साथ.......... दिल के तार झनझना उठते हैं खुशियों से तो कभी गम से उन्हीं भावनाओं से प्रेरित होकर उभरते हैं दिल मे और छा जाते हैं पन्नों पर वाक्य रूपी शब्द कभी चाँद की चाँदनी मे तो कभी सूर्य की रोशनी मे हवा के वेग से फड़फड़ाता है पन्ना ऐसा लगता है उड़कर चला जाएगा वहाँ........... जहाँ से निकल रहें हों कुछ मंत्र यहीं तो है प्रेम पत्र..........................
दोस्तों कुछ दिनो बाद लौटा हूँ इस आइलैंड पर..... दिल्ली छोड़कर नोएडा आ गया हूँ बीजी रहता हूँ समय नहीं मिल पाता है कुछ पोस्ट करने का सबको मेरा नमस्कार ...... एक समान धन्यवाद नोटीस करने के लिए
कु. संतोष नोएडा
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